परंपरागत रूप में पुनर्जागरण को इतिहास के किन्हीं खास काल खंडों से जोड़ कर देखा जाता रहा है। इसकी वजह कुछ ऐसी परिघटनाएं हैं, जिनका समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ा। तथापि गहरे में वह एक ऐसी प्रक्रिया है, जो लगातार घटित होती रहती है।
जैसे हम रोज़ सोते हैं, रोज़ एक नयी सुबह होती है और उसके साथ रोज़ हम एक नये रूप में जागते हैं। उसी तरह हमारा पुनर्जागरण भी नित नये रूप में संभव होता रहता है। जागना उसी तरह की घटना है, जैसे जीना, ज्ञान अर्जित करना और रूपांतरित होना। इनमें कुछ भी ऐसा नहीं, जिसे आप शाश्वत या सनातन कह सकें। यह कहना कि हम सदियों से सोये थे या हमेशा से जागी हुए थे, जीवन और प्रकृति के बुनियादी नियमों के विरुद्ध खड़े होना है।
हर युग और उसके समयों की अपनी चुनौतियां और अपनी संभावनाएं होती हैं। उन्हीं के मुताबिक पुनर्जागरण भी भिन्न रूपों में घटित होने की ओर लगातार आगे बढ़ता है। सामूहिक रूप में समाज किन्हीं क्षेत्रों में अधिक जागरुक होते हैं और किन्हीं पक्षों की उपेक्षा करते हैं। जो क्षेत्र और मुद्दे उपेक्षित होते हैं, उनके संदर्भ में उपस्थित संकट हमें जगाता है। वह किन्हीं खास समस्याओं के प्रति जागने की चुनौती को जन्म देता है। उन चुनौतियों के मद्देनज़र उस दौर और वक्त का पुनर्जागरण एक अलग शक्ल लेने लगता है।
जैसे, आज हम जिस समय में हैं, सांप्रदायिक और राष्ट्रवादी चेतना के उभार ने हमारे लिये कुछ नयी चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। उनसे समाज की एकता और अखंडता का सांस्कृतिक तानाबाना छिन्न भिन्न न हो जाये, इसे लेकर उपस्थित दुविधा ने, हालात को संकटग्रस्त बना दिया है। ऐसे में हमारे समय के गर्भ से जिस तरह के पुनर्जागरण की संभावना जन्म ले सकती है, वही हमारी सर्वाधिक ज़रूरी चिंता भी है।
संकट जितना बड़ा है, उसे देखते हुए लगता है कि समकाल में संभावित पुनर्जागरण एक नयी परिघटना होने जा रहा है। हालांकि उसके रास्ते में खड़े किये गये अवरोधक भी इतने बड़े हैं कि हम किसी नये सकारात्मक रूपांतर की उम्मीद सहज ही कर पायें, ऐसा कदापि नहीं है।
हाल ही में संगीतकार टी एम कृष्णा ने एक गौरतलब सवाल उठाया है कि 'हमारे स्कूलों, घरों या सांस्कृतिक संस्थाओं में अब 'सर्वधर्म प्रार्थनाएं' क्यों नहीं होतीं। तो हम अचानक एक दिन अपने नागरिकों से यह उम्मीद कैसे कर सकते हैं कि वे सभी धर्मों का बराबर सम्मान करेंगे?' धार्मिक सहिष्णुता को बढ़ाने के लिये टी एम कृष्णा का स्कूलों में सर्व धर्म प्रार्थनाएं करने का सुझाव व्यावहारिक लगत है। ऐसे तरीके पहले भी अनेक दफा आज़माये जा चुके है। पर अधिक चिंता की बात यह है कि हमने भारत में समाज सांस्कृतिक और धार्मिक बराबरी, सहनशीलता और भाईचारे को बढ़ाने के लिये ऐसे किसी तरह के सजग प्रयास करने अब छोड़ दिये हैं।
हालांकि 19वीं शती के आधुनिक नवजागरण की सांस्कृतिक विरासत इस संदर्भ में हमारे लिये उपयोगी हो सकती है, पर वक्त के साथ उसने अब अपनी ज़मीन काफी हद तक खो दी है। तब भारत की सोच में एक सकारात्मक तब्दीली दिखाई देनी आरंभ हो गयी थी। धर्म का सांप्रदायिक रूप, पीछे छूट रहा था और उसे मानवीय संस्कृति के रूप में देखा जाना आरंभ हो गया था। इसके पीछे हमारा शिक्षित मध्य वर्ग था, जो धीरे धीरे वैज्ञानिक चेतना से युक्त हो रहा था। इस बात को ज़मीनी रूप दिया था, ब्रह्मो सभा (राममोहन राय 1828), ब्रह्मो समाज ( केशवचंद्र सेन 1866), आदि ब्रह्मो समाज (देवेंद्रनाथ टैगोर), तत्वबोधिनी सभा (1839), धर्म सभा (राधाकांत देव), प्रार्थना सभा (आत्माराम पांडुरंग, भंडारकर और रानाडे 1876) और सत्यशोधक समाज (ज्योतिबा फुले 1873) जैसी संस्थाओं ने। और इस सोच की परिणति हुई थी, महात्मा गांधी की 'सर्व धर्म प्रार्थना' सभाओं के रूप में।
परंतु आज़ादी मिलने के बाद से वह सिलसिला रुक गया। उसकी जगह आ गया संविधान, जो धर्म निरपेक्ष होने की बात करता है। परंतु वह बात हमारी व्यापक जनचेतना का हिस्सा होने के बजाय, एक राजनीतिक 'डिस्कोर्स' में बदल जाती है। धर्म, अपनी साम्प्रदायिक ज़मीन के साथ अलग खड़े रह जाते हैं। धीरे धीरे धर्म निरपेक्षता को एक विदेशी आयात बता कर गैर ज़रूरी बनाया जाने लगता है। राजनीति का वोट की राजनीति वाला जो रूप नुमाया होता है, वह धीरे धीरे देश को हिंदू, मुस्लिम और सिख राजनीति के सांप्रदायिक उभार की ओर ले जाता है।
ऐसे में इस बात पर पुनर्विचार करना ज़रूरी लगता है कि क्या भारत में सर्व धर्म समभाव की कोई सांस्कृतिक परंपरा है या नहीं है? धर्म निरपेक्षता की धारणा विदेशी लग सकती है, पर उसकी आड़ में सर्व धर्म समन्वय की बात को खारिज कर देना भी अनुचित लगता है।
यहां, इस संदर्भ में आदि शंकराचार्य की 'पंचायतन पूजा पद्धति' की ओर फिर से देखने का प्रस्ताव आपके सामने रखना चाहता हूं। इस पद्धति की बात करने वाले लोग अब बहुत नहीं रह गये हैं। पर अगर आप पूरे भारत में नौवीं शती के बाद वाले मंदिरों के निर्माण की ओर ध्यान से देखेंगे, तो इस बात को समझना कठिन नहीं होगा कि वहां इस पंचायतन सोच की कितनी बड़ी भूमिका रही है। ये मंदिर भारत में प्रचलित तत्कालीन धर्मों के अनेक रूपों के समन्वय का उदाहरण हैं। खास तौर पर शैव, वैष्णव और शाक्त धर्मों को एक साथ एक ही पूजा स्थल में अगर बगल बिठा देने का महत्वपूर्ण कार्य इन मंदिरों के द्वारा कर दिखाया गया। शैवों और वैष्णवों के बीच कभी कभार जो एक दूसरे को जान से मार देने की हद तक चली गयी दुश्मनी का इतिहास है, वह इस पंचायतन पद्धति के लोकप्रिय होने के बाद बहुत कम ही सिर उठाता है।
यहां यह बात विचारणीय है कि आखिर क्यों, इसी सर्व धर्म समन्वय वाली सोच के तहत, बाद में अकबर 'दीने इलाही' के 'सुलह कुल' वाले रूप को भारत की बुनियादी सोच का हिस्सा बनाना चाहता है, पर कामयाब नहीं होता?
और यह बात भी उतनी ही विचारणीय है कि जब गांधी की प्रार्थना सभाओं में, हिंदू मुस्लिम को एक ही जगह बराबर ला कर बिठा देने वाले 'ईश्वर अल्लाह तेरो नाम' की बात सामने आती है, तो उस पर सर्वाधिक ऐतराज़ नाथू राम गोडसे जैसे कट्टर हिंदू को होता है। वह गांधी की हत्या करके, उसके इस सर्व धर्म समन्वय की भी हत्या करने की कोशिश करता है।
भारतीय समाज अपने मन से एक उदार, मानवीय और सहनशील समाज है। परंतु हम कुदरती तौर पर जो हैं, वह हमारा अचेतन व्यक्तित्व है। हमने अपनी इस सांस्कृतिक चेतना को सजग तौर पर जीने लायक नहीं बनाया।
आदि शंकराचार्य के द्वारा स्थापित ज्योतिर्लिंग एक शुरुआत करते हैं और फिर भारत में ऐसे मंदिर बनने लगते हैं, जहां कम अज़ कम पांच देवी देवताओं की मूर्तियां स्थापित होने लगती हैं। यह भारत में व्यावहारिक हो सका पहला और एकमात्र ऐसा प्रयोग है, जिसने भारत के सहिष्णु अंतर्व्यक्तित्व को सांस्कृतिक ज़मीन प्रदान करने की सजग कोशिश की। उसके व्यापक परिणाम भी निकले।
पर अकबर और गांधी अपनी समन्वयी सोच को, शंकराचार्य की तरह न तो कोई गहरी दार्शनिक सैद्धांतिकी दे सके और न ही वह बात व्यापक रूप में मान्य सांस्कृतिक धार्मिक संस्थाओं के निर्माण तक पहुंच सकी।
हम जो दरअसल हैं और हमें राजनीतिक और सांप्रदायिक प्रचार के द्वारा जो करने के लिये कहा जाता है, उसमें एक बड़ी खाई दिखाई देती है। ऐसे दुष्प्रचार से एक भ्रम पैदा होता है कि हमारी वास्तविक परंपरा आखिर है क्या।
हम अपने मानवीय और समन्वयी स्वरूप को भूलते जा रहे हैं। इससे एक समस्या पैदा होती है। उदार मना होने के कारण हम सांप्रदायिक विद्वेष और नफरत से भर कर जीना नहीं चाहते। पर हम हिंदू मुसलमान के दरम्यान नफरत फैलाने वालों का विरोध करने की स्थिति में भी नहीं होते। अल्पसंख्यक होने के कारण मुसलमान और अन्य धर्मावलंबी, जो इस नफरत की सियासत के निशाने पर आ जाते हैं, सामान्य हिंदू लोग उन का न तो विरोध करना चाहते हैं और न उनके पक्ष में ही खड़े हो पाते हैं। ऐसा करके वे सांप्रदायिक ताकतों के निशाने पर बेवजह ही आ सकते हैं, जिससे वे बचना चाहते हैं।
ऐसे हालात में अब हमारा समाज, एक सहनशील समाज नहीं रह गया है। एक दूसरे को ज़रा सा भी अपने विरोध में खड़ा पाकर, उनसे नफरत करने का चलन सा हो गया है। इस मानसिकता को गहराने में सोशल मीडिया ने व्यापक भूमिका निभाई है। व्हाट्सेप आदि की मदद से सुनियोजित रूप में झूठा इतिहास बोध खड़ा किया जा रहा है। नतीजतन हमारा समाज उदार मना हिन्दू मुसलमान के कुंठित होकर रह जाने की हालत में आ गया है।
यह स्थिति इसलिये भयावह है, क्योंकि उदार हृदय से ताल्लुक रखने वाली सहनशीलता ने जैसे अपनी भाषा खो दी है। हमारे पास, सार्वजनिक रूप में ऐसे हालात का प्रतिरोध कर सकने वाले शब्दों की कमी पड़ गयी है।
'क्रांति' शब्द का इस्तेमाल करते हैं, तो लगता है, जैसे हम किसी हिंसक गिरोह के सदस्य हो गये हैं।
जब हम 'धर्मनिरपेक्ष' होने की बात करते हैं, तो लगता है, जैसे हम अल्पसंख्यक धर्म-समुदाय के तुष्टीकरण का फायदा उठाने वाली सियासत करने लगे हैं।
समानता, स्वतंत्रता, बंधुता, न्याय, प्रजातंत्र, सर्वोदय और संविधान का सम्मान करने जैसी बातें भले ही अभी तक अर्थपूर्ण लगती हैं, पर वे हमें ऐसे 'पढ़े लिखे बुद्धिजीवी' की श्रेणी में ले जाकर खड़ा कर देती हैं, जिसे समाज का एक बड़ा तबका ज़मीनी हकीकत से कटा हुआ मानता है।
उदारता और सहनशीलता को इलेक्ट्रोनिक मीडिया चैनल और व्हाटसैप ग्रुप कायरता, अकर्मण्यता और पलायन की मानसिकता से जोड़ने में कामयाब होते जाते हैं।
इस तरह हम पाते हैं कि ऐसी सोच रखने वाले लोगों के पास बहुत थोड़ी सार्वजनिक 'स्पेस' बची है। वे अपनी बात को ठीक से रख पाने लायक नहीं रह गये हैं। रखते हैं, तो उनकी बात इतने कम लोगों तक पहुंचती है कि कही खोकर रह जाती है। लोग ऐसी बातों को सुनना, समझना और उनके साथ खड़े होना चाहते हैं, पर खुद को हाशिये पर डाल दिये जाने की वजह से निष्क्रिय पड़े से दिखाई देते हैं। उनसे जुड़ा तमाम विमर्श, सिवाय भविष्य की उम्मीद जगाये रखने के, और कुछ नहीं कर पाता। अपने समय में हस्तक्षेप करना, जैसे उसके बस की बात नहीं रह गया है।
अगर हम अपने समय की इस दुविधा और सीमा को समझ पा रहे हैं, तो हम पूछ सकते हैं कि विकल्प क्या है?
मुझे लगता है कि यह समय नवजागरण के अधूरे पड़े रह गये लक्ष्यों की पूर्ति के लिये भूमिका बनाने का समय है। पर इस शब्द के साथ भी वही दिक्कत है।
'नवजागरण' और 'प्रबोधन' जैसे शब्द भी अभिजात बौद्धिक ( इलीट इंटेलेक्चुअल) के द्वारा ही इस्तेमाल में लाये जाने वाले शब्द हो गये हैं। इनका प्रयोग करने से भी यही लगता है कि सामान्यजन के लिये इनका कुछ खास अर्थ नहीं है।
हम चाहते हैं कि हम आदमी के इन्सां होने की बात करें और वह भी एक हिंदू या एक मुसलमान हुए बगैर कर पाएं। पर ऐसा करने के तमाम तरीके और रास्ते खो गये हैं। हम अपने देश को बेहतर लोगों के एक बेहतर समाज की तरह देखना चाहते हैं, पर हमारे पास उदार और सहनशील होने के विकल्प नहीं बचे हैं। ले देकर जो बात 'सर्वधर्म समभाव' की बात तक आकर रुक गयी है, उसका संबंध भी एक अच्छे हिंदू, मुसलमान, सिख या ईसाई होने से होता है। हमारे यहां आधुनिक नवजागरण के आखिरी महानायक महात्मा गांधी हमें वहीं तक ले गये थे। वे एक अच्छे हिंदू और एक अच्छे मुसलमान को ऐसे आदमी की तरह देखते थे, जो 'ईश्वर अल्लाह तेरो नाम' तो कहता था, पर हिंदू और मुसलमान बना रहता था। दोनों धर्मों को, एक ही परमात्मा को पूजने वाले दो अलग धर्मों की तरह देखने की बात, 'न हिंदू न मुसलमान' होने की बात नहीं बन पाई थी।
बेशक हम अब भी 'सर्वधर्म प्रार्थना सभाएं' आयोजित करके इस दिशा में फिरसे एक शुरुआत कर सकते हैं। पर हमें ऐसी प्रार्थनाओं को एक नयी शक्ल देनी पड़ेगी। हमें उन्हें भारत के लोगों की एक नयी धार्मिक सांस्कृतिक 'पहचान' हो जाने लायक बनाना पड़ेगा। इसके लिये हमें अपनी सांस्कृतिक परंपरा की एक नयी व्याख्या करनी होगी। और दूसरे, उसे अपने देश के वास्तविक इतिहास बोध की तरह ग्रहण करने लायक बनाना होगा। आइये देखते हैं कि क्या ये मुमकिन है?
हमारे समाज का, खास तौर पर नयी पीढ़ी का सांप्रदायिक 'ब्रेनवाॅश' होना आरंभ हो चुका है। इससे बाहर निकलने के, बाकी रास्तों के बंद हो जाने के बावजूद, एक व्यावहारिक रास्ता ज़रूर बचा रह गया है। वह है, अंग्रेज़ी माध्यम वाली उच्च शिक्षा को हासिल करके उस दुनिया का हिस्सा हो जाना, जिसे हम बहुराष्ट्रीय कंपनियों की भूमंडलीय (ग्लोबल) दुनिया कहते हैं। अगर हम हालात की इस पेचीदगी को समझ पा रहे हैं, तो हमें सोचना होगा कि जिसे हम 'हिंदी नवजागरण' कहते हैं, उसका हमारे समय तक आते आते क्या हश्र हुआ है।
हालात ऐसे हो गये हैं कि जिस हिन्दी नवजागरण में, समाज को बदलने या प्रबोधित करने की गुंजायश दिख रही थी, वह 'भारत को विश्वगुरू' बनाने के राजनीतिक अभियान में बदल कर, 'हिंदू नवजागरण' का रूप ले चुका है।
जैसा ऊपर कहा गया है कि नवजागरण की बात लोगों को समझ नहीं आती, पर सब लोग जानते हैं कि हमारे फिर से विश्वगुरु होने के सपने का क्या मतलब है। लोग इस सपने की हकीकत समझते हैं। उस आधार पर हिंदू धर्म की मान्यताओं, आख्यानों, मंदिर आदि संस्थाओं, ग्रंथों और कर्मकांडों की अधकचरी वैज्ञानिक व्याख्या कर ली जाती है।
फिर एक 'नैरेटिव' खड़ा किया जाता है कि हमारे पास बहुत कुछ है, जिससे पूरी मानवजाति का कल्याण हो सकता है, पर अभी संसार इस लायक नहीं हुआ है कि हमारी बातों की गहराई और ऊंचाई को समझ सके। इसलिये कहा जाता है कि जैसे जैसे विज्ञान का और विकास होगा, हिंदू धर्म की कालजयी मान्यताओं के पीछे छिपे नये रहस्य उजागर होंगे। तब दुनिया हमारी तरफ उम्मीद से देखेगी और हमें खुद ही विश्वगुरु मान लेगी। आइए, इस 'नैरेटिव' की गहराई में उतरते हैं।
इसे हम धर्म का 'अधकचरा ज्ञानात्मक पुनर्गठन' कह सकते हैं। हिंदू धर्म का बुनियादी ढांचा ज्ञानात्मक नहीं है। किसी भी धर्म का नहीं होता। इसके बजाय, धर्मों की ज़मीन, ज्ञान मूलक विचारों और सिद्धांतों के कर्मकांडी रूपों पर खड़ी होती है। कर्मकांड आस्था से चलते हैं। हमारे यहां आस्था के लिये 'श्रद्धा' शब्द का इस्तेमाल होता है। इसका मतलब सत्य को धारण करना होता है। तो, ज्ञान की जो बातें सत्य सिद्ध होती हैं, उन्हें कर्मकांड की शक्ल देकर धारण कर लिया जाता है। इसलिये हिंदू धर्म में बेशुमार कर्मकांड हो गये। बेशक उनका संबंध भी ज्ञान से बना रहा। शुरू में ज्ञान को प्रतीक रूप में कर्मकांड का रूप दिया गया। पर बाद में ज्ञान पीछे छूट गया और हमारे हाथ कर्मकांड ही कर्मकांड रह गये। उनकी ज्ञान मूलक व्याख्या करना चाहें, तो वह आज भी मुमकिन है।
पर समस्या ये है कि कर्मकांड में आस्था रखने वाला जो भक्त समाज पैदा हो जाता है, वह कर्मकांड को ही सनातन सत्य मानने लगता है। तो उस के लिये राम, कृष्ण शिव, हनुमान, दुर्गा, उनकी मूर्तियां, मंदिर, जप, कीर्तन, झांझ, खड़ताल, घंटा, आरती, परिक्रमा, धूप, दीप, नैवेद्य, आरती, पुष्प, चंदन, हवन, दुग्ध, घृत आदि तमाम प्रतीक, प्रतीक न रह कर पवित्र, पूज्य, रक्षणीय और ईश्वर के पर्याय हो जाते हैं।
यही स्थिति भिन्न कर्मकांडों के संदर्भ में इस्लाम, सिख, ईसाई, यहूदी, बौद्ध, जैन आदि धर्मों की भी है। सब के पास बचाने लायक अपने अपने सत्य हैं। परंतु प्रतीकों को पीछे छोड़ कर सत्य या सार मात्र को बचाने की बात अधर में लटकी रह जाती है। अगर कुछ बचा रहता है, तो वे छूछे प्रतीक होते हैं, जो कर्मकांडी औपचारिकता निभाने के काम आते हैं। पीछे छिपे सत्य की तरफ कोई नहीं देखता।
प्रतीकों की वैज्ञानिक व्याख्या करके सभी धर्म खुद को महान और बचाने लायक साबित करते रहते हैं। सबकी दिलचस्पी अपने अपने सत्य को सनातन सिद्ध करने में होती है। पर सच ये है कि यह बात ही विडंबना पूर्ण है। धर्म अपने सत्य को बचाने के लिये जिस विज्ञान की मदद लेते है, वह खुद सत्य के सनातन होने का कोई दावा नहीं करता।
जिन बातों को धर्म विज्ञान की मदद से भी सिद्ध नहीं कर पाता, उन्हें आस्था से बचाने लगता है। जैसे आत्मा और ईश्वर की धारणाएं हैं। उन्हें धर्म सनातन कहता है, उनमें यकीन रखने का आग्रह करता है, उन्हें पाने या पा सकने की बात को सच बनाने के लिये अनेक झूठी सच्ची कथाओं को प्रचारित करता है। फिर वह अनुभव में आनंदित होने की बात का ढोंग करता है।
सब लोग जानते होते हैं कि धार्मिक कर्मकांड से किसी को ईश्वर नहीं मिलता, फिर भी लोग धार्मिक बने रहते हैं।
इसके दो कारण हैं। एक है आत्म सम्मोहन। हम इस भ्रम को छोड़ना नहीं चाहते कि हो सकतो है, कभी हमारी आस्था दृढ़ हो जाये और हमें ईश्वर मिल जाएं। हम जानते हैं, नहीं मिलेंगे, पर इस विश्वास को हम तोड़ना नहीं चाहते। इससे संकटकाल में आखिरकार एक सहारा बचा रह जाता है। इससे मरना तक आसान हो जाता है, यह एक मनोवैज्ञानिक तरकीब है, जो बड़े काम की है। झूठी है, पर काम की है। इसलिये हम उस झूठ को सच बनाने में लगे रहते हैं।
दूसरी चीज़ है, 'पहचान'। धर्म हमें एक पहचान देता है। वह पहचान सामाजिक ही नहीं, सांस्कृतिक भी होती है। उसका एक राष्ट्रीय या जातीय पहलू तक होता है। यह पहचान हमें इतनी गहराई में पकड़ लेती है कि उसे खोते ही लगता है, हम कहीं के नहीं रहे। भारत में यह धार्मिक पहचान वर्ण धर्म से जुड़ी होने के कारण हमें विविध जातिगत समूहों से भी बांधे रहती है। इस पहचान से बंधे रहना, हमारे सामाजिक प्रभाव का हेतु होता है। वह प्रभाव हमारी शक्ति का सहज स्रोत बना रहता है।
पर अधिक शक्तिशाली होने के लिये हमारा धार्मिक या भक्त होना ही पर्याप्त नहीं होता। पर सामान्यतः लोग इससे मिलने वाली पहचान और उसके सीमित प्रभाव से संतुष्ट रहते हैं।
फिर धार्मक होने से एक सुविधा भी मिलती है। हम ज्ञान को खुद अर्जित करने से बच जाते हैं। ज्ञान के एक नैतिक मूल्य हो जाने की वजह से ऐसा होता है। नैतिक मूल्य हमें सामाजिक वैधता देते हैं।
सामान्य लोगों को, आम तौर पर जितनी ज़रूरत होती है, उतनी ताकत धर्म से खुद ब खुद मिल जाती है। पर इसके लिये लोगों को भक्त बनना पड़ता है। धर्म की रूढ़ियों और कर्मकांडों से बंधे रहना उनकी मजबूरी हो जाती है।
पर अगर कोई अधिक शक्ति अर्जित करना चाहता है, तो उस के लिये उसे ज्ञान और राजनीति की ओर रुख करना पड़ता है। ज्ञान और राजनीति अतिरिक्त शक्ति के स्रोत इसलिये होते हैं, क्योंकि इनकी मदद से धार्मिक चेतना के सामान्य रूपों से बंधे रहने की मजबूरी से कुछ हद तक छुटकारा मिल जाता है। ज्ञान उन्हें धर्म की असलीयत को समझने में मदद करता है। अपने ज्ञान के कारण वे भक्तों में मकबूल भी हो जाते हैं। वे चाहें तो धर्म के बंधनों को मानने से इन्कार कर सकते हैं। पर शक्तिशाली तभी होते हैं, जब वे भक्तों की सामूहिक ताकत का अपने हित के लिये इस्तेमाल कर पाते हैं। इसके लिये वे भक्त होने का दिखावा करते रहते हैं। धर्म से ऊपर उठ सकने की गुंजायश पा लेने के बावजूद,उन्हें भी धार्मिक होने दिखने के पाखंड से छुटकारा नहीं मिलता। जिन्ना इसका एक उदाहरण हैं। वैसे अधिकांश प्रजातांत्रिक राजनीति करने वाले लोग भी, कमोबेश उसी कोटि में रखे जा सकते हैं।
धर्म जो नैतिक दबाव पैदा करता है, वह एक तरफ शक्ति देता है, तो दूसरी तरफ हमें अनेक ऐसे मूल्यों से भी बांधता है, जिन्हें हम विवशता में स्वीकार करते हैं।
सत्य की खोज हमारी ज्ञान मूलक भूख को शांत करने के लिये ज़रूरी है। धर्म इस काम को कठिन बताता है। इसके बजाय वह हमें कुछ नैतिक मूल्यों का पालन करने की ओर ले जाता है। वचन का पालन, मैत्री, अतिथि सत्कार, माता पिता पति ब्राह्मण और गुरू को देवतुल्य मानना, पातिव्रत्य, इंद्रिय निग्रह, अल्पाहार, व्रत, तीर्थ स्नान जैसी बातें सामान्य नैतिक व्यवहार के लक्षण मान ली जाती हैं। धीरे धीरे धर्म की रक्षा के लिये प्राण त्याग देने या किसी के प्राण लेने की बात भी एक तरह के नैतिक व्यवहार का हिस्सा बना दी जाती है। जब ऐसा होता है, तब लोग महसूस करते हैं कि वे धर्म की वजह से ऐसी बातों को मूल्यवान मानने के लिये विवश हैं, जिन्हें वे 'अधार्मिक' भी कह सकते हैं। ऐसे में वे धर्म की वजह से खुद को फंसा हुआ तक अनुभव कर रहे होते हैं। पर इसका फायदा उठा कर धर्म के उत्साही रक्षक, समाज के नये नायकों या शहीदों की तरह भी, खुद को पेश करने में कामयाब हो जाते हैं।
यह सब इसलिये मुमकिन हो पाता है,, क्योंकि धर्म झूठा दावा करते हैं, ऐसे उच्चतर मानवीय मूल्यों तक ले जाने का, जो कुदरती आधार वाले होते हैं। इनमें शान्ति, आनंद, आत्म साक्षात्कार, ज्ञान प्राप्ति और मुक्ति तक को शामिल कर लिया जाता है। परंतु व्यवहार में वे कर्मकांड और नैतिक कार्य कलापों तक सीमित रहते हैं।
मूल्यों के मामले में धर्मों का यह रवैया उनके दोहरे होने का सुबूत है। इससे लोगों को भुलावे में रखने का इंतज़ाम हो जाता है और धर्म अपने असली मकसद में कामयाब हो जाते हैं। मानवीय मूल्यों के ज़रिये लोकमंगल करने का दावा करके, वे अपना असली मकसद छिपा लेते हैं। वह मकसद होता है, लोगों को दान दक्षिणा के लिये प्रेरित करने का। इस तरह धर्म, लोगों से धन एंठने की शोषणकारी सांस्कृतिक संस्था बन जाते हैं। मज़े की बात यह है कि लोग स्वेच्छा से अपने साथ ये सब होने देते हैं। इस तरह एक परजीवी की तरह धर्म, समाज को चूसते हुए, उसे पतनशील बनाते हैं। वह भी लोगों को मुक्त करने के नाम पर। ऐसा इसलिये होता है, क्योंकि लोगों को लगता है कि वहां बहुत कुछ ऐसा भी है, जो अच्छा है।
पर धर्म में जो कुछ अच्छा है, वह अध्यात्म और ज्ञान की दुनिया से उधार लिया गया होता है। इसलिये वे लोग जो धर्मों की असलियत समझ लेते हैं, ज्ञान प्राप्ति, रूपांतर और मुक्ति के लिये या तो अध्यात्म की ओर चले जातेहैं, या विज्ञान की ओर।
जिन समाजों में विज्ञान की भूमिका अहम होती है, वहां धर्म को निजी आस्था की वस्तु मान कर राजनीति के धर्मनिरपेक्ष माॅडल को अपना लिया जाता है। परंतु हम जानते हैं कि आज़ादी मिलने के बाद हमने भले ही अपने संविधान तक में धर्मनिरपेक्ष प्रजातंत्र वाली व्यवस्था को अपना लिया था, पर हमारा समाज धर्म से बंधा रहा।
इससे दो तरह के भारत का जन्म हो गया। एक अंग्रेज़ी स्कूलों से पढ़ कर निकलने वालों का भारत था, जो विज्ञान को शक्ति के नये स्रोत की तरह देख रहा था। इसलिये उस समाज की राजनीति भी अलग तरह की थी। परंतु उसका क्षेत्र सीमित था। वह विश्वविद्यालयों से बाहर नहीं आ सका।
इसलिये हमारी राजनीति के लिये शक्ति का स्रोत वे बहुसंख्यक लोग हो गये, जो धर्म से बंधे थे। उनके लिये ज्ञान विज्ञान अध्यात्म और मुक्ति की संभावनाएं, धर्म से निकलती थी, और धर्म में ही चुक जाती थीं। उनके पास वह हिंदू और इस्लाम धर्म थे, जिनकी मान्यताएं सामंती थीं। पिता, पति गुरू और शासक के हाथों में सत्ता की कुंजी थी। इस तरह कानून के राज की जगह, प्रधानमंत्री की छवि के राज के हालात पैदा हो गये।
बौद्धिक लोग सब समझते थे, पर उनकी बात समझने वाले लोग नहीं बचे रह गये थे। इससे धर्म के मनमाने इस्तेमाल के हालात पैदा हो गये। नैतिक व्यवहारों के लिये तो लोग फिर भी तैयार थे, पर अब बात धर्म की रक्षा के लिये मुसलमानों के प्रति नफरत करना और हिंदू राष्ट्र की स्थापना के लिये, उनपर हमले तक करने के लिये लामबंद होने की बात भी, हिंदू होने की नैतिकता मे शामिल हो गयी थी।
यहां पहुंच कर अब ज़रूरी हो गया है कि हम धर्म के सवाल पर चुप न बैठे रहें। जो वाजिब सवाल हैं, उन्हें उठाने की हिम्मत दिखाएं। और अपने लोगों के बीच जाकर उनसे पूछें कि उन्हें क्या चाहिये? धर्म या मुक्ति? हिंदू राष्ट्र या विकसित भारत? हिंसा की संस्कृति या मानवीय सभ्यता?
धर्म के पैरों तले से उसकी ज़मीन उस वक्त खिसकने लगती है, जब हम धर्म और अध्यात्म में फर्क करने लगते हैं।
इसलिये सच्चे अर्थ में आध्यात्मिक होना, हमारे समय का नवजागरण और सांस्कृतिक इंकलाब है।
हम एक ऐसे दौर में हैं, जब कोई आध्यात्मिक व्यक्ति हमारी रहनुमाई करने के लिये शेष नहीं है। रमन महर्षि, अरविन्द और जे. कृष्णमूर्ति जैसे लोगों की हमें आज फिर से बड़ी ज़रूरत है। ये लोग बुनियादी सवाल उठाने वाले लोग थे। ऐसे सवालों के जवाब धर्म के पास नहीं होते।
पर दिक्कत ये है कि आधुनिक काल के ये आध्यात्मिक लोग भी, गोरखनाथ, कबीर और नानक की तरह, लोक चेतना के नये नायक नहीं हो सके थे। इसलिये हमें अचानक वहां लौटना पड़ेगा, उस 11वीं सदी में, जब गोरख अलख निरंजन को जगाने वाले अपने योगियों के साथ, पूरे भारत की चेतना का रूपांतर करने के लिये प्रकट हो गये थे।
एक तीसरी वजह भी है। वह यह है कि गोरख के साथ हिन्दी पहली दफा आकार लेती दिखाई देती है और आज हमारे दौर में हिन्दी नवजागरण की संभावनाएं अब तक की सर्वाधिक अवरुद्ध स्थिति में हैं।
हिंदी का विकास अपने मूल रास्ते से भटक गया है। गोरखनाथ, अमीर खुसरो और कबीर के अंग संग जिस हिन्दी का विकास हो रहा था, वह बहुत सी भाषाओं के समन्वय और आपसदारी वाली भाषा थी।
संस्कृत से निकलीं अपभ्रंशों के अरबी फारसी से हेल मेल से जो भाषा बनी थी, उसे हिंदी या हिंदवी कहा गया। अनेक संस्कृतियों के सच का सार वहां मनुष्य को मनुष्य की तरह बोलने में मदद कर रहा था। 11वीं शती से लेकर 16वीं शती के मध्य तक यह सिलसिला चलता रहा।
फिर ऐसी हिंदी लिखने और बोलने की बात होने लगी, जो अधिकाधिक 'वेद पुराण निगमागम सम्मत' हो। इसके लिये तुलसी के 'रामचरित मानस' के आरंभिक स्तुति पदों की भाषा के लिये तो, सीधे सीधे संस्कृत को ही चुन लिया गया। उनके बाद के दौर में लिखी गयी 'कवितावली' जैसी कृतियों में उनका थोड़ा मोहभंग ज़रूर होता है। वहां राम को ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती के संबोधन से, यानी 'गरीबनिधाज' की तरह पुकारा गया है। वे खुद को किसी दरबार के मनसबदार की तरह न देखने की बात भी करते हैं।
हम चाकर रघुबीर के, पट्टो लिखो दरबार ,
अब तुलसी का होइ है, नर के मंसबदार
अरबी फारसी के मेलजोल से हमारे यहां जिस हिंदी का विकास होने लग पड़ा था, उस प्रक्रिया को 16वीं शती के मध्य में उलट दिया गया। नतीजतन हिंदी का, हिंदी की तरह विकास रुक गया। अलबी फारसी से यथासंभव परहेज़ की प्रक्रिया हमारे सूर तुलसी के साथ आरंभ होती देखी जा सकती है।
फिर 19वीं शती में अंग्रेज़ों के आ जाने के बाद तो हिंदी का, हिंदी और उर्दू में स्पष्ट और तीखा सांप्रदायिक विभाजन हो जाता है।
आज़ादी की लड़ाई के दौरान केवल गांधी हैं, जो हिंदी को हिंदुस्तानी के रूप में ग्रहण करते हैं और उसे अपने उसी मूल व्यक्तित्व में लौटने में मदद करते हैं, जिसकी शुरुआत गोरखनाथ से हुई थी।
लेकिन तत्कालीन हिंदी साहित्य, गांधी वाले हिंदी नवजागरण की उस समन्वयी ज़मीन को अपनाने के लिहाज से दुविधा का शिकार नज़र आता है।
प्रेमचंद जैसे लेखक भी, जो हिंदी और उर्दू, दोनों में लिखते थे, या तो दोनों ज़बानों के लिये अलग रचनाएं लिखते थे, या कुछ हेर फेर के साथ उनके दो पाठ तैयार करते थे।
हिंदी नवजागरण को पहले तो उसके साहित्यकारों ने कमज़ोर किया, फिर आज़ादी मिलने के बाद, हिंदी के राजभाषा के रूप में नव निर्माण ने, उसकी तेजस्विता और समन्वयी भावभूमि को करीब करीब नष्ट कर दिया।
हिंदी से उम्मीद थी कि वह भारत की विविधता मूलक संस्कृति की ज़ुबान बनती, पर नवजागरण की यह ज़मीन उसके नीचे से कब सरक गयी, पता ही नहीं चला।
हालांकि हमारी फिल्मों ने इस आपसदारी को कभी नहीं छोड़ा, परंतु इस दुनिया के सरोकार मूलतः व्यावसायिक थे, इसलिये उसकी नवजागरण मूलक भूमिका संदिग्ध बनी रही।
अब सवाल ये है कि हमारे पास क्या बचा है? कहां से शुरुआत करें कि हम 16वीं शती के मध्यकाल से रुके अपने फिर से मनुष्य हो सकने के आत्मसंघर्ष से जुड़ सकें? क्या करें कि गान्धी, अपने युग की सीमाओं की वजह से, अपना जो काम बीच में छोड़ कर रुख़सत हो जाते हैं, उसे उसके मुकाम तक ले जा सकें?
इसके लिये पहला काम तो हमें यही करना होगा कि हम गोरख, खुसरो, कबीर और नानक को, नये अर्थ में दोबारा खोजें।
दूसरा काम हमें यह करना होगा कि गांधी के 'ईश्वर अल्लाह तेरो नाम' को आधार बनाकर हम उसे भी गोरख कबीर नानक के, 'न को हिन्दू न मुसलमान' वाली बात तक ले जायें।
पर यहां समस्या यह होगी कि वह जो न हिंदू है, न मुसलमान, न सिख है न ईसाई, न बौद्ध है, न जैन, उसे हम उसकी नयी पहचान क्या देंगे।
यह प्रश्न सबसे अधिक विकट है। गोरख ने उस धर्मेतर पहचान वाले मनुष्य को 'जोगी' कहा।
हिन्दू ध्यावै देहुरा
मुसलमान मसीत ।
जोगी ध्यावै परम पद
जहाँ देहुरा न मसीत
हालात बदले, तो कबीर ने उसे 'साधु' का नाम दिया। जोगी और साधु की पहचान भी रूढ़ होने लगी, तो नानक ने उसे 'सिख' कहना आरंभ कर दिया। ऐसे ही रैदास के पीछे पीछे ऐसे मनुष्य को 'भगत' की तरह देखा गया। लेकिन ये 'भक्त' और 'भगत', दोनों हमारे समय तक आते आते खास अर्थों में बंधे दिखाई देने लग पड़े हैं।
भक्त समाज, मुख्यत: श्रीराम और हनुमान के भक्तों के ऐसे समाज का पर्याय हो गया है, जो भारत को हिंदू राष्ट्र के रूप में देखना चाहता है। रैदास भगत, वाल्मीकि और बौद्ध पहचान दूसरी तरफ विविध दलित जन समूहों के साथ जुड़ गयी है।
गान्धी की आज़ादी की लड़ाई के भीतर से 'सत्याग्रही' और 'सुराजिये' अपनी अलग पहचान के साथ सामने आये, परंतु वह भी अब भारत के मनुष्य मात्र की पहचान का आधार नहीं रह गये हैं।
व्यवस्थित संगठित धर्मों से जुड़ी पहचान के धर्मेतर विकल्प खोजने के अतीत में जो प्रयास हुए हैं, अब हमें उनसे अलग, किसी नयी पहचान वाले मनुष्य की ओर आना पड़ेगा।
इसे ऐसी पहचान की तरह स्वीकार्य बनाना पड़ेगा कि कोई अगर आपसे पूछे कि आप क्या हैं, तो जवाब में आप मुस्करा कर कह सकें, न हिंदू, न मुसलमान, मेरा तो है 'सर्वधर्म ईमान'।
जब हमारे यहां धर्म निरपेक्षता की बात उठी, तो अनेक लोगों का ध्यान इस बात की ओर गया कि सामान्य भारतीय धर्मनिरपेक्ष नहीं होता, पर वह 'सर्वधर्म समभाव' वाला हो सकताहै। लेकिन यह बात चली नहीं, क्योंकि इसे परंपरा पुष्ट ज़मीन नहीं मिल सकी।
जबकि अगर हमने अपनी सांस्कृतिक परंपरा की ओर ठीक से देखा होता, तो वहां कुछ ऐसा ज़रूर मिल जाता, जिसका हम अपने समय के इतिहास बोध की मदद से विकास कर सकते थे।
इसका संबंध आदि शंकराचार्य के साथ है, जैसा कि इस आलेख के आरंभ में संकेत किया जा चुका है।
अगर हम अपने समय के हिंदुत्व के उभार की ज़मीन अपनी परंपरा में कहीं ठीक से खोजने निकलते हैं, तो वह हमें आदि शंकराचार्य की परंपरा से सीधे जुड़े, 'दशनामी अखाड़े' तक ले जायेगी। अंग्रेज़ों के भारत में पैर जमाने आरंभ करते ही बंगाल की नवाबी हुकूमत के खिलाफ जो संन्यासी विद्रोह हुआ था, उसकी कमान दशनामियों के हाथ में थी।
दुर्गा की शक्तिमाता के रूप में पूजा को उन्होंने, भारतमाता की एक नयी देवी की तरह स्थापना करके, राष्ट्रभक्ति का रूप दे दिया था।
यह उनकी 'पंचायतन पूजा पद्धति' का विस्तार था। इसमें हिंदू धर्म के उदार और समन्वयी रूप की मौजूदगी को देखा जा सकता है। यह पद्धति अभी रूढ़ नहीं हुई थी, इसलिये वहां स्थानीय देवी देवता के रूप में, भारतमाता के देवी रूप को स्थान मिल सका था।
संन्यासियों के उदार होने का दूसरा सुबूत यह है कि उन्हें इस्लाम से संबद्ध 'फकीरों' का सहयोग मिला था।
जहां तक फकीरों के इतिहास का संबंध है, उस बारे में की गयी खोज हमें, गोरखनाथ के 'मुसलमान जोगियों' तक ले जा सकती है। वे मूलतः सूफी थे, जो जोगी होकर दर दर घूमने वाले 'फकीरों' में बदल गये थे। इन फकीरों को अनेक ग्रंथों में 'रमता जोगी' भी कहा गया है।
यहां तक हमें भारत में समन्वय मूलक आपसदारी की संस्कृति के मौजूद होने के संकेत मिल जाते हैं, जिसकी परंपरा आदि शंकराचार्य और गोरखनाथ से होती हुई उस दौर में भारतमाता की एक देवी के रूप में प्रतिष्ठा में बदलती नज़र आती है।
यहां तक भारत सांस्कृतिक धरातल पर एक और अखंड दिखाई देता है। 'पंचायतन पूजा' में तत्कालीन देवी देवताओं के उन सभी वर्चस्वी रूपों को जगह दी गयी थी, जिनकी लोक में अत्यधिक प्रतिष्ठा थी। सूर्य, शिव, शक्ति और विष्णु, ये चार देवी देवता उस दौर तक अत्यधिक प्रतिष्ठित थे। इन चारों में पांचवें देवी देवता के रूप में किसी भी स्थानिय विभूति को शामिल किया जा सकता था। यह भारत के आठवीं नवीं शती के सांस्कृतिक समन्वय का समीकरण था।
हम जानते हैं कि बाद के समयों में सूर्य का महत्व कम हो गया था। विष्णु के स्थान पर राम और कृष्ण की प्रतिष्ठा अधिक हो गयी थी। फिर अठारहवीं सदी में भारतमाता के देवी रूप के प्रतिष्ठित हो जाने के बाद उसकी हैसियत स्थानिय देवी की नहीं रह गयी थी।
परंतु ग्यारहवीं सदी में गोरख के भारत व्यापी महत्व को देखते हुए यह बात भी उभर कर सामने आने लगी थी कि आदि शंकराचार्य के अद्वैत सिद्धांत को यह पंचायतन पूजा पूरी तरह आत्मसात नहीं कर पा रही थी। देवी देवताओं की पूजा के समांतर 'अलख निरंजन' के ध्यान की बात भी उतनी ही अर्थपूर्ण थी, जितनी साकार देवी देवताओं की पूजा।
इसलिए भारत में जब इस्लाम का प्रवेश होता है, तो उसके निराकार अल्लाह से संवाद की स्थितियां, गोरख के अलख निरंजन के साथ ही बन पाती हैं। जैसे ही यह संवाद शुरू होता है, गोरख की अहमियत मुहम्मद से कम नहीं रह जाती और एक नया समीकरण निकलता है कि हमें न हिंदू होना है, न मुसलमान, हमारा जोगी होना पर्याप्त है।
इसीलिये गोरख के बाद के भारतीय सूफियों ने 'मुहम्मद बोध' नाम से इस योग परंपरा के, एक नये ग्रंथ की रचना तक कर डाली थी। यह बात इस्लाम के अब तक के पूरे इतिहास में, सांस्कृतिक समन्वय का एक अप्रतिम उदाहरण प्रतीत होती है।
तथापि हम यह भी देख सकते हैं कि इस्लाम और बाद में भारत में आई ईसाइयत में, ईश्वर और मनुष्य के बीच मध्यस्थ का काम करने वाले मुहम्मद और क्राइस्ट की उतनी ही प्रतिष्ठा है, जितनी हमारे यहां देवी देवताओं कीं। पर वे देवता न कहला कर, ईश्वरदूत या पैगंबर कहलाते हैं। वैसे यह बात इन धर्मों को एकदम अजनबी बनाने की वजह नहीं है। यह हमारी अपनी वैदिक परंपरा में भी, अग्नि के अन्य देवों और ब्रह्म के बीच दूत होने की तरह, थोड़े अलग रूप में विद्यमान है।
इन बातों पर गौर करेंगे, तो हम एक नये सांस्कृतिक समीकरण को जन्म देने की संभावना तक पहुंच सकते हैं। हम 'पंचायतन पूजा' की जगह 'पंचायतन या पंचायती प्रार्थना' को चुन सकते हैं।
ऐसा करने से प्रार्थना सभा के बंगाली रूप से लेकर गांधी के भजन कीर्तन तक का, वैदिक परंपरा सम्मत रूप विकसित हो सकता है। इसे हम भारत की 'धर्म पंचायत' कह सकते हैं। इसके पंचों का चुनाव एक वृहत धर्म मंडल से किया जा सकता है।
पहले पंच के रूप में राम, हनुमान और कृष्ण, यानी वैष्णव परंपरा में से एक ले सकते हैं।
दूसरे पंच के रूप में शिव, दुर्गा, गणेश, यानी शैव परंपरा में से एक।
तीसरे में निर्गुण निराकार निरंजन वाली परंपरा के पैरोकारों के रूप में बुद्ध, महावीर,, आदि शंकराचार्य, गोरखनाथ, फरीद, कबीर, रैदास और नानक में से एक।
चौथे पंच में मुहम्मद, क्राइस्ट और अब्राहम, यानी वैश्विक धर्म परंपरा में से एक को लिया जा सकता है।
और पांचवे को पूर्ववत स्थानीय रूप में महान और पूज्य माने जाने वालों में से किसी एक को ले सकते हैं, फिर भले ही वे गांधी, भगत सिंह और अंबेडकर जैसे इतिहासपुरुष, या इन सबको आत्मसात करने वाली भारतमाता ही क्यों न हो।
बेशक ये नये मंदिर भी नयी तरह के कर्मकांडों से युक्त होकर बड़ी जल्दी रूढ़ हो सकते हैं। पर भारत की विषैली होती जाती सांस्कृतिक आबोहवा को कुछ वक्त के लिये, इस तरह के उपायों से, सांस लेने लायक तो बनाया ही जा सकता है।
मैं इस तरह के उपाय आज़माने की बात इसलिये करना चाहता हूं क्योंकि गोरख से लेकर नानक तक भारत जिस आपसदारी की ओर आगे बढ़ा था, उसे भक्ति के संकीर्ण विमर्श के द्वारा 'आन देवता चित्त न धरऊं' के दड़बों में बंद करके, दमघोंटू बना दिया गया था। 'मामेकम् शरणं व्रज' के सिद्धान्त ने, वेदों के उस सिद्धांत को निरस्त कर दिया था, जिसमें पूरे विश्व के सभी मंगलकारी विचारों को खुले मन से स्वीकार करने की बात की गयी है।
'आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतो' (ऋग्वेद 1/89)
अपने यहां की उदार मना सांस्कृतिक परंपरा में उपजा दूसरा विचार है,, 'एकं सद्विप्रा बहुधा वदंति'। इनमें बहुलतावादी विचारों को स्वीकृति दी गयी है।
परंतु फिर जब सभी देवों का एक ईश्वर या ब्रह्म में विलय मान लिया गया, तो अवतारवाद का वह रूप सामने आया, जिसने किसी अन्य के पनपने के लिये गुंजायश खत्म कर दी। बस वही से भारत ने अपनी आत्मा को खो देना आरंभ कर दिया।
ईश्वर के अवतार ही नहीं, पैगंबर या दूत भी बहुत से हो सकते हैं, इस विचार को स्वीकार करते ही परस्पर विद्वेष की नींव हिल जाती है।
विविधता बहुलता के रास्ते के परित्याग के लिये तर्क यह दिया जाता है कि इसके कारण हिंदुओं का पराभव हुआ और उसे मुसलमानों और ईसाइयों का गुलाम हो जाना पड़ा। यह अपने भीतर के कलह , वर्ण विभाजन और शूद्रों व स्त्रियों के दमन आदि से संबंध रखने वाले अपने दुर्गुणों पर पर्दा डालने के लिये खोजा गया बहाना है। हिंदू जाति के पराभव के कारण, उसकी संकीर्णता, पाखंड, आत्म विभाजन और अपने लोगों के दमन में छिपे हैं। हमारे भीतर ये बुराइयां नहीं होतीं तो हमारा पराभव भी नहीं हुआ होता।
पर हम आज भी आत्म विश्लेषण से दूर भागते हैं। परंपरा के प्रासंगिक पुनर्विकास का साहस हमने खो दिया है। हमारे समाज को लकीर का फकीर बनाये रखने से, हमारे वर्चस्वी लोगों को सत्ता पर अधिकार जमाये रखने का मौका मिलता है। इसलिये हमें एक वैज्ञानिक सोच रखने वाले समाज में बदलने ही नहीं दिया जाता। हिंदू मुसलमान को आपस में लड़ा कर जिन्हें शासन करने का अवसर मिलता है, वे स्वार्थी और अदूरदर्शी हो गये हैं। दूरकी बात वे सोचते ही नहीं। उन्हें जैसे अपनी सत्ता से मतलब है, चाहे उसके लिये भारत के भविष्य को नफरत की आग में क्यों न झोंकना पड़े।
इससे बाहर निकलने के लिये पहल तो हम लोगों को खुद ही करनी होगी। 'धर्म पंचायत' एक शुरुआत हो सकती है। इसका मकसद सामान्य जन की चेतना को लोकतांत्रिक बनाने का होना चाहिये। सच्चे लोकतंत्र की स्थापना के अलावा हमारे लिये बेहतर भविष्य में प्रवेश का यह एक उपाय तो ज़रूर हो सकता है।
▪︎ संपर्क: मो 9814658098



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