परंपरागत रूप में पुनर्जागरण को इतिहास के किन्हीं खास काल खंडों से जोड़ कर देखा जाता रहा है। इसकी वजह कुछ ऐसी परिघटनाएं हैं, जिनका समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ा। तथापि गहरे में वह एक ऐसी प्रक्रिया है, जो लगातार घटित होती रहती है। जैसे हम रोज़ सोते हैं, रोज़ एक नयी सुबह होती है और उसके साथ रोज़ हम एक नये रूप में जागते हैं। उसी तरह हमारा पुनर्जागरण भी नित नये रूप में संभव होता रहता है। जागना उसी तरह की घटना है, जैसे जीना, ज्ञान अर्जित करना और रूपांतरित होना। इनमें कुछ भी ऐसा नहीं, जिसे आप शाश्वत या सनातन कह सकें। यह कहना कि हम सदियों से सोये थे या हमेशा से जागी हुए थे, जीवन और प्रकृति के बुनियादी नियमों के विरुद्ध खड़े होना है। हर युग और उसके समयों की अपनी चुनौतियां और अपनी संभावनाएं होती हैं। उन्हीं के मुताबिक पुनर्जागरण भी भिन्न रूपों में घटित होने की ओर लगातार आगे बढ़ता है। सामूहिक रूप में समाज किन्हीं क्षेत्रों में अधिक जागरुक होते हैं और किन्हीं पक्षों की उपेक्षा करते हैं। ज...