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समकाल में पुनर्जागरण ▪︎‌ विनोद शाही

       परंपरागत रूप में पुनर्जागरण को इतिहास के किन्हीं खास काल खंडों से जोड़ कर देखा जाता रहा है। इसकी वजह कुछ ऐसी परिघटनाएं हैं, जिनका समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ा। तथापि गहरे में वह एक ऐसी प्रक्रिया है, जो लगातार घटित होती रहती है।       जैसे हम रोज़ सोते हैं, रोज़ एक नयी सुबह होती है और उसके साथ रोज़ हम एक नये रूप में जागते हैं। उसी तरह हमारा पुनर्जागरण भी नित नये रूप में संभव होता रहता है। जागना उसी तरह की घटना है, जैसे जीना, ज्ञान अर्जित करना और रूपांतरित होना। इनमें कुछ भी ऐसा नहीं, जिसे आप शाश्वत या सनातन कह सकें। यह कहना कि हम सदियों से सोये थे या हमेशा से जागी हुए थे, जीवन और प्रकृति के बुनियादी नियमों के विरुद्ध खड़े होना है।        हर युग और उसके समयों की अपनी चुनौतियां और अपनी संभावनाएं होती हैं। उन्हीं के मुताबिक पुनर्जागरण भी भिन्न रूपों में घटित होने की ओर लगातार आगे बढ़ता है। सामूहिक रूप में समाज किन्हीं क्षेत्रों में अधिक जागरुक होते हैं और किन्हीं पक्षों की उपेक्षा करते हैं। ज...

अवतारवाद से मुक्ति: 'पूर्णावतार' और 'शिलावहा' के बहाने / विनोद शाही

अवतारवाद की पौराणिक धारणा, एक अर्से से भारतीय धर्म-संस्कृति की मुख्य पहचान होती चली गयी है। हालांकि उसकी जड़ें न वेदों में हैं और न ही उपनिषदों में। इस बारे में थोड़ी खोज करें, तो आसानी से पता चल जायेगा कि यह धारणा, उत्तर पुराणकाल में ही कहीं जाकर अपने मौजूदा रूप में गठित होती है। यह दसवीं शती के आसपास का काल है। इसलिये इसके सनातन होने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता।       इसके बावजूद, राम और कृष्ण के अवतार होने की बात, भारत की धार्मिक सांस्कृतिक पहचान का पर्याय हो गयी है। इतना ही नहीं, यह धारणा भारतीय जनमानस की चेतना में इतनी गहराई में उतर गयी है, कि इसके अनादि होने के बारे में, आम तौर पर किसी को कोई संदेह नहीं होता।       राम और कृष्ण के सह समांतर शिव, पार्वती और गणेश के अवतार होने की बात भी प्रचलित अवश्य है, परंतु उनकी व्याप्ति तुलनात्मक रूप में  इतनी नहीं है।       छठी शताब्दी के बाद रचे गये अग्नि और गरुड़ जैसे पुराणों में राम और कृष्ण को विष्णु के दशावतारों में स्थान दिया गया था, परंतु दसवीं शताब्दी के आसपास, भागवत पुराण ने...

युवा शायर महेंद्र कुमार सानी : उर्दू-हिंदी की साझी विरासत का सिपाही

ये रौशनी में कोई और रौशनी कैसी कि मुझमें कौन ये मेरे सिवा चमकता है?  महेंद्र कुमार 'सानी' महेंद्र कुमार को उसके छात्र जीवन से जानता हूँ। यहीं गवर्नमेंट कॉलेज में बी काम प्रथम वर्ष का विद्यार्थी और किताबों से दोस्ती करने का जुनून । धीरे धीरे आधार उसका ठिकाना बना और वह चुपचाप किताबें उठाकर कई कई घंटों उन्हीं में खोया रहता। बी काम करने के बाद  एम बी ए करने के लिए शायद मेरा सुझाव और दबाव काम आया। अब वह फाइनांस का आदमी था और कुछ साल अपने कैरियर के प्रति सजग।  शादी हुई बिटिया हुई और घर परिवार के दायित्व बढ़े और अचानक एक दिन वे महेंद्र कुमार सानी के रूप में अवतरित हुए। वे रेख़्ता बुक्स से प्रकाशित अपना पहला  ग़ज़ल संग्रह मेरे हाथों में रख खुश थे।  यह सब आपकी बदौलत।  मैंने कहा कैसे मैं तो शायरी का अलिफ़ बे तक नहीं जानता। बस यूँ समझें एकलव्य की तरह मैंने यह सब आपसे पाया है। अरे तुम तो अर्जुन हो जिसे अब एक बड़े युद्ध में धकेला जाना है।  इस बीच महेंद्र कुमार ने कई उर्दू उपन्यासों का तर्जुमा किया।  उर्दू के कई बड़े प्रकाशकों के लिए किताबों की कॉपी एडिटिंग भी की...