हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन की लम्बी परम्परा है। बहुत से इतिहास लिखे गए, धीरे धीरे काम इतना बड़ा होता चला गया कि कुछ संस्थाओं से बहुत से लेखकों को अपने साथ जोड़कर वृहद् इतिहास के अनेक खंड प्रकाशित हुए। परन्तु जो काम होने से रह गया था वह था इतिहास दृष्टि से आये बदलाव के लिहाज़ से उसे दोबारा लिखना, दूसरा वहां छूट गए अन्तराल को भरना और तीसरा सभी कृतियों का अपने युगबोध के मुताबिक पुनर्पाठ करना। हमें प्रसन्नता है कि इस दिशा में हमारे समय के कुछ महत्वपूर्ण आलोचक सक्रिय हुए हैं। इस सन्दर्भ में देवेंद्र चौबे बहुत से लेखकों को अपने साथ जोड़कर एक बड़ी परियोजना पर काम करने में लगे हैं। हिंदी साहित्य के इतिहास के पुनर्लेखन के लिए भूमिका बनाने की लिहाज से यह काम अत्यंत जरुरी है जो इस क्षेत्र में एक बड़े अभाव की पूर्ति करने जा रहा है। पांच खण्डों की इस परियोजना में प्रोफेसर देवेंद्र चौबे व उनके सहयोगी संपादक प्रखर युवा आलोचक अजय कुमार यादव और गणपत तेली के सपादन में पहला खंड 'हिंदी साहित्य का इतिहास : कुछ पाठ, कुछ विचार' पिछले ही वर्ष अक्तूबर में जारी किया गया था। अभी इस के द...