ये रौशनी में कोई और रौशनी कैसी
कि मुझमें कौन ये मेरे सिवा चमकता है?
महेंद्र कुमार 'सानी'
महेंद्र कुमार को उसके छात्र जीवन से जानता हूँ। यहीं गवर्नमेंट कॉलेज में बी काम प्रथम वर्ष का विद्यार्थी और किताबों से दोस्ती करने का जुनून । धीरे धीरे आधार उसका ठिकाना बना और वह चुपचाप किताबें उठाकर कई कई घंटों उन्हीं में खोया रहता। बी काम करने के बाद एम बी ए करने के लिए शायद मेरा सुझाव और दबाव काम आया। अब वह फाइनांस का आदमी था और कुछ साल अपने कैरियर के प्रति सजग। शादी हुई बिटिया हुई और घर परिवार के दायित्व बढ़े और अचानक एक दिन वे महेंद्र कुमार सानी के रूप में अवतरित हुए। वे रेख़्ता बुक्स से प्रकाशित अपना पहला ग़ज़ल संग्रह मेरे हाथों में रख खुश थे। यह सब आपकी बदौलत। मैंने कहा कैसे मैं तो शायरी का अलिफ़ बे तक नहीं जानता। बस यूँ समझें एकलव्य की तरह मैंने यह सब आपसे पाया है। अरे तुम तो अर्जुन हो जिसे अब एक बड़े युद्ध में धकेला जाना है।
'आधार चयन : प्रतिनिधि शायरी ' के अंतर्गत उर्दू के बारह बड़े शायरों की रचनाओं के संकलन का चयन एवं सम्पादन का जिम्मा महेंद्र कुमार सानी ने अपने सिर ले लिया है। पहले सेट में ग़ालिब, मीर और नज़ीर अकबराबादी के चयन हम आगामी वर्ष विश्व पुस्तक मेला में जारी करने जा रहे हैं। हालांकि फिलवक्त वे ग़ालिब की किताब की पाण्डुलिपि को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। उम्मीद करता हूँ नवम्बर अंतिम सप्ताह तक तीनों किताबों की पांडुलिपियां हमें मिल जाएँगी।



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