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आलोचक विनोद शाही: हिंदी आलोचना में एक नई जमीन तोड़ने का प्रयास


शुरूआती दौर में टेरी ईगल्टन की किताब 'लिटररी थ्योरी' और रेमंड विलियम्स की 'मार्क्सिज्म एंड लिटरेचर' ने मेरी रूचि पश्चिम की आलोचना पद्धतियों की ओर बढ़ाई । मैं उन विमर्शों के स्कूलों की तरफ गया, जो इन पद्धतियों के सामने आने की भूमिका बने थे।
फ्रैंकफर्ट स्कूल की इस सन्दर्भ में जो क्रांतिकारी भूमिका रही है उससे कुछ ज्यादा ही प्रभावित हुआ था। लेकिन पश्चिमी विमर्शों के प्रभाव में अपना काम करना अलग बात है और साहित्य की जमीन पर अपना घर बनाना एकदम अलग बात।

मेरे मन में यह विचार बार बार परेशानी सी पैदा करता रहा है। क्या हिंदी में कोई आलोचना के सिद्धांतों पर कोई ऐसी मौलिक किताब लिख सकता है जिसे इस तरह की वैश्विक महत्व की किताबों के समकक्ष रखा जा सके। मेरी इस दबी छिपी आकांक्षा की पूर्ति मेरे दोस्त वरिष्ठ आलोचक एवं चिंतक विनोद शाही ने की है। अभी उनकी इसी दिशा में एक और लम्बा सफर तय करने की प्रबल इच्छाशक्ति अभी भी बची है।



विनोद शाही की किताब 'आलोचना की जमीन' जैसे ही मेरे पास प्रकाशन के लिए आई, मुझे लगा कि यहां हिंदी आलोचना की सैद्धांतिकी की दुनिया में एक नया अध्याय लिखे जाने की शुरुआत हो गई है। मैंने विनोद शाही से बात की और कहा कि यह क्षेत्र है जो हिंदी में उपेक्षा का शिकार है। जवाब में यह लेखक उसके बाद इसी विरल परंतु कठिन क्षेत्र में चुपचाप चला गया और एकांत साधना करते हुए उसने एक के बाद एक आलोचना की सैद्धांतिकी की अनेक बेहतरीन किताबें लिख डाली। काम विश्व स्तरीय था, परंतु इस तरह की किताबें देखने, पढ़ने और समझने के लिए जिस तरह के संस्कार की जरूरत होती है वह शायद हिंदी आलोचना जगत के पास नहीं था। दूसरी बात यह भी थी कि जिस लेखक को कोई बड़ा काम करना होता है, वह स्वयं को आत्म प्रचार के झमेले में उलझा देने से बचता रहता है। बतौर प्रकाशक मैं भी इतने समय तक यह प्रतीक्षा करता रहा कि हिंदी जगत की निगाह देर सवेर इस महत्वपूर्ण कार्य पर अवश्य पड़ेगी। पर कहीं कुछ नया और बेहतर हो रहा है यह बात भी विद्वानों के पास जाकर उन्हें बतानी पड़ती है। उनकी आलोचना की सैद्धांतिकी पर केंद्रित निम्न छः पुस्तकें 'आलोचना के नये प्रतिमान', 'हिंदी आलोचना की सैद्धांतिकी', 'कथा की सैद्धांतिकी' ,'आलोचना की जमीन' और 'हिंदी साहित्य का इतिहास : उतर औपनिवेशिक विमर्श' हिंदी आलोचना के लिए एक अनूठा काम है और फिलवक्त अपनी तरह का इकलौता।

इसलिए अपनी इस पोस्ट को मैं यहां पूरे हिंदी जगत के प्रति एक विनम्र अनुरोध की तरह जारी कर रहा हूं। समय और धैर्य हो तो आप इन किताबों को अवश्य पढ़ें। कम से कम मुझे संतोष होगा कि आपने इन किताबों को पढ़ने के बाद ही यह तय किया है कि इनके साथ क्या बर्ताव किया जाना चाहिए। हो सके तो इस पूरे सेट को या इनमें से कुछ किताबों को मंगवा कर अवश्य पढ़ें और यदि लगे कि यहां हम हिंदी आलोचना को समृद्ध करने के लिए एक नई जमीन तोड़ने की ओर आगे बढ़े हैं, तो हमारे इस प्रयास में खुले मन से सहयोगी भी बने।

देश निर्मोही - (डायरी के पन्ने से)

टिप्पणियाँ

  1. विनोद शाही के कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए एक उम्दा टिप्पणी।

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